लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है कि नारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ न केवल भारतीय कानून की सत्ता को चुनौती देता है, बल्कि यह देश की संप्रभुता और अखंडता के भी खिलाफ है। कोर्ट ने माना कि ऐसे नारे लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाते हैं और इसलिए दंडनीय हैं। अदालत में इस दौरान विभिन्न धर्मों के नारों का उल्लेख किया, जिसमें ‘जय श्रीराम’ और ‘हर-हर महादेव’ का भी जिक्र हुआ। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा भारतीय न्याय प्रणाली को चुनौती देता है, जो संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। अदालत के अनुसार, यह कृत्य भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है, जो देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है। अदालत ने कहा, “गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा लगाना न केवल भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देता है, बल्कि भारतीय कानूनी व्यवस्था के खिलाफ भी है, जहां सजा का निर्धारण कानून और संविधान के अनुसार होता है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर धर्म में नारे और उद्घोष होते हैं, जिनका उद्देश्य ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करना होता है। जैसे इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर-हर महादेव’। लेकिन यदि किसी नारे का इस्तेमाल डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के लिए किया जाए तो वह अपराध बन जाता है। अदालत ने यह भी कहा कि ‘सर तन से जुदा’ नारे का कुरान या इस्लाम के किसी प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथ में कोई उल्लेख नहीं है। इसके बावजूद, कई लोग इसके अर्थ और प्रभाव को समझे बिना इसका इस्तेमाल करते हैं। कोर्ट ने इस नारे की उत्पत्ति का जिक्र करते हुए कहा कि यह नारा पाकिस्तान से फैलकर भारत समेत अन्य देशों में आया और इसका इस्तेमाल कुछ तत्वों द्वारा अन्य धर्मों के लोगों को डराने और राज्य की सत्ता को चुनौती देने के लिए किया गया। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि पैगंबर मोहम्मद ने अपमान के बावजूद करुणा और क्षमा का मार्ग अपनाया था और कभी भी इस तरह की हिंसा की वकालत नहीं की। अदालत ने टिप्पणी की कि पैगंबर के नाम पर किसी व्यक्ति की हत्या या सिर कलम करने की बात करना, उनके आदर्शों का अपमान है। यह टिप्पणी बरेली में सितंबर में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। इस मामले में आरोपी रिहान ने खुद को निर्दोष बताते हुए जमानत मांगी थी। हालांकि, कोर्ट ने केस डायरी में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर कहा कि आरोपी एक अवैध भीड़ का हिस्सा था, जिसने आपत्तिजनक नारे लगाए, पुलिसकर्मियों को घायल किया और सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। अदालत ने कहा, “इस मामले में जमानत देने का कोई आधार नहीं है।” कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी। इस मामले में आरोपी की ओर से अधिवक्ता अखिलेश कुमार द्विवेदी ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने पैरवी की।

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