काशीपुर। यूजीसी की 2026 की नई गाइडलाइंस को लेकर सामाजिक सामाजिक कार्यकर्ता गौतम मेहरोत्रा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने इसे ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ बताते हुए कहा कि यह सामान्य वर्ग को फंसाने के लिए झूठी शिकायतों को बढ़ावा दे सकती है और इससे कैंपस में सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है। गौतम मेहरोत्रा का मानना है कि इन नियमों का इस्तेमाल सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। कहा कि, 2025 के ड्राफ्ट में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था, जिसे 2026 के अंतिम नियमों से हटा दिया गया है। इक्विटी कमेटी या समता समितियों में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधियों की अनिवार्यता न होने पर चिंता जताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता गौतम मेहरोत्रा ने कहा कि इससे जांच एकतरफा होने का डर है। सामाजिक सौहार्द पर भी इसका खासा असर पड़ेगा। ये नियम शिक्षा के मंदिर में जातिगत विद्वेष पैदा कर सकते हैं और भाई को भाई से लड़ाने जैसा माहौल बना सकते हैं। 24 घंटे में शिकायत और 15 दिनों में जांच की समयसीमा पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि इससे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हनन हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिलहाल 2026 के इन संशोधित रेगुलेशंस पर रोक लगाने और 2012 के नियम लागू रहने का गौतम मेहरोत्रा ने स्वागत किया है। साथ ही कहा कि धर्म, जाति, और पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव किसी भी शैक्षणिक संस्थान, विश्वविद्यालय या सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।


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